दोहा छंद के नियम और उदाहरण

दोहा छंद के नियम और उदाहरण यह अर्द्ध सममात्रिक छंद है । इसके चार चरण होते है । विषम चरणों अर्थात् प्रथम व तृतीय का मात्रा भार 13 होता है व सम चरणों अर्थात् द्वितीय व चतुर्थ का मात्रा भार ग्यारह होता है । दोहा छंद का आरंभ जगण से करने पर लय दोष उत्पन्न होता है इसलि… और पढ़ें

उपजाति सवैया

उपजाति सवैया  विधान :  उपजाति सवैया क्रमशः दो  सवैया का  योग है , अथवा मिश्रित रूप है । जैसे इस सवैया में क्रमशः मत्तग्यन्द सवैया और सुंदरी सवैया का समावेश है । ताप परे नित तेज लग्यौ अब, फागुन ग्रीष्म ऋतू भर आईं मेल    मिलाप  करें  ऋतु दो, बचकेउ  नव… और पढ़ें

भगवती वंदना (पद)

अब तौ  आजा  मात भवानी तोहि   रिझामें, तोहि   मनावें, रे  ! जग की ठकुरानी अर्चन - वंदन  कौ  विधान का, बोध न, हम  अज्ञानी श्रद्धामय   हो   थाल   सजायौ, करें    भाव   अगवानी कुमकुम  टीका   भाल लगाऊँ, ओढ  चुनरिया  धानी धूप, दीप,   नैवैद्य,  समर्पित,  तुमको   मा… और पढ़ें

मैंने देखी नारि हजार

मैंने   देखी   नारि   हजार पर    ऐसी   कहूँ   न पाई जब   देखी  पहली   बारी   बू   नारि   सुशीला  न्यारी बाने  कूटी  सब  ससुरारि संग पति की करी  कुटाई मैंने   देखी   नारि   हजार पर    ऐसी   कहूँ   न पाई आयौ    दूजी  कौ  नम्बर बाकौ   खातौ   पीत… और पढ़ें

उपेन्द्रवज्रा छंद

उपेंद्रवज्रा छंद  UPENDRAVJRA CHHAND [जतजगुगु] छंद विधान :  क्रमशः  जगण, तगण, जगण, दो गुरु न   साधना,  वंदन, मोहि  आवै तुम्हें  रिझाऊँ, विधि  को बतावै सुवासिनी   सिद्ध  सुकाज कीजै विवेक औ बुध्दि “नवीन” दीजै - नवीन श्रोत्रिय उत्कर्ष उपेन्… और पढ़ें

पदपादाकुलक छंद

पदपादाकुलक छंद का विधान एवं उदहारण पदपादाकुलक  छंद  {PADPADAKULAK CHHAND} पदपादाकुलक   छंद विधान  :  –   पदपादाकुलक छंद  के चार चरण होते हैं, प्रत्येक चरण में १६ मात्रायें होती हैं , छंद के आरम्भ में एक गुरु अथवा दो लघु (लघु-लघु) अनिवार्य होता है किन्तु त्रिक… और पढ़ें

कृष्ण विशाखा वार्तालाप (पद)

तोकूँ   ढूँढू    वर   मैं   सुयोग जो तेरे मन   भाय   विशाखा, जाकौ   तेरौ     योग चन्द्र    सरीखौ, वीर   बाँकुरौ, तन कौ  रह्यौ  निरोग रूठे  तौ    पढ़   प्रेम  रिझावै, मेटै  आत्म  अनुयोग कृष्ण  कन्हाई  सों   नैन  समावै, सुखद विवाह संयोग क्यों कर… और पढ़ें

नाय करी मैंने माखन चोरी (पद)

BHAKTIPAD नाय  करी   मैंने    माखन  चोरी अकारथ  मोय   फ़ँसा   रहीं  रीबात  बनामत कोरी निस दिन छेड़त,कारौ कह-कह,और आप कूँ  गोरी छुपा     बाँसुरी, मारै     कांकर,कहें मटकिया फोरी करौ   भरोसौ  को   विधि  मैया,तू  तो  है बड़ भोरी और पढ़ें

जै ले रे गोपाल कन्हाई

जैं  लै   रे  गोपाल  कन्हाई दाल चूरमा, माखन मिसरी, नहीं दूध दधि  लाई रूखी सूखी, गेहूँ     रोटी, जो   मो  सों बन पाई ता संग डरी लाई हूँ गुड़ की,दो अब भोग लगाई का  भावै   तेरे मन   कान्हा, जानै   को  यदुराई - नवीन श्रोत्रिय उत्कर्ष और पढ़ें

Sundari-madhavi Savaiya

सुंदरी-माधवी सवैया विधान : क्रमशः आठ सगण और एक गुरु  अभिमान बुरौ जग जानत है, पर मानत को यह भेद भलौ है । मन मानहु भूल गयौ अपनौ, अपमान सहे सुख  गैर खलौ है । अपनेउ   रिवाज  तजे सगरे, अब रीति पछाँह  नवीन चलौ है । जिस ओर निहार रहे नयना, उस ओर हमें यह दृश्य… और पढ़ें

अब संहार जरूरी है

उ ठे धूल की जब जब आँधी, तो जलधार जरूरी है उठे  धूल  की  जब  जब आँधी, तो    जलधार   जरूरी है बहुत   हुआ  जुर्मों  को   सहना, अब    संहार   जरूरी  है आज  एक   नारी की  इज्ज़त, लुटती  रही  भीड़  भर में  खड़े रहे  कुछ  मौन  साध कर, कुछ  दुबके अपने घर में कुछ के  अ… और पढ़ें