वियोग श्रृंगार-चौपाइयाँ छंद

चौपाइयाँ छंद छंद परिचय :-    छंद सनातनी परंपरा का लोकप्रिय छंद है, जिसका प्रयोग मुख्यतः बाबा तुलसी रचित रामचरित मानस में किया है । इस छंद की अन्य की भाँति कुल चार पँक्ति होती है, प्रत्येक  पँक्ति में यति (विराम) क्रमशः दस, आठ, बारह मात्राओं पर  सुनिश्चित ह… Read more

माहिया छंद

माहिया छंद टप्पे महिया   तुझपे  मरते        जबसे   मैंने  जाना है जां  तेरे     ही     नां        ख्वाब     तिरे     देखे हम प्यार तुम्हे करते         इक  तुमको  पाना है कब आओगे मिलने         क्यों मतलब यारी को सावन  आया   अब     … Read more

माहिया छंद - प्रसिद्ध पंजाबी टप्पे

छंद : माहिया इज्जत है  इबादत है  सच   मानो   यारो वो फक्त  मुहब्बत है  कब  प्रेम  जताने को झलका   इस  तरहा तू  प्रीत  पै'माने को मुझको न सताओ तुम चाहतहै,    छल  है ये  भेद बताओ  तुम है  दर्द  मुहब्बत  ये … Read more

मत्तगयंद सवैया और अनुप्रास अलंकार का उदहारण

जय महाकाल  मत्तगयंद सवैया और अनुप्रास अलंकार का उदहारण (मत्तगयंद सवैया ) काल कराल कमाल करे, कब भक्त कपालि अकाल सतावै प्रेम, प्रभूति, पराक्रम औ, परिख्याति, परंजय, पौरुष पावै भाव भरी, मनसे, भगती, भय, भूत, भजा, भवभूत मिलावै ध्यान धरौ नित शंकर… Read more

हरिपद छंद

हरिपद छंद   हरिपद छंद विधान :  कुल 27 मात्रायें, चार चरण  दो पंक्तियाँ समतुकांत, अंत में गुरु लघु आवश्यक उदाहरण :-  आधार छंद : हरिपद सोलह  ग्यारह   पर लिखने  हैं, चार चरण  दो  बंद  चौपाई  दोहा   का  मिश्रण, है    यह   हरिपद    छंद  सत्त… Read more

दोहा छंद के नियम और उदाहरण

दोहा छंद के नियम और उदाहरण यह अर्द्ध सममात्रिक छंद है । इसके चार चरण होते है । विषम चरणों अर्थात् प्रथम व तृतीय का मात्रा भार 13 होता है व सम चरणों अर्थात् द्वितीय व चतुर्थ का मात्रा भार ग्यारह होता है । दोहा छंद का आरंभ जगण से करने पर लय दोष उत्पन्न होता है इसलि… Read more

उपजाति सवैया

उपजाति सवैया  विधान :  उपजाति सवैया क्रमशः दो  सवैया का  योग है , अथवा मिश्रित रूप है । जैसे इस सवैया में क्रमशः मत्तग्यन्द सवैया और सुंदरी सवैया का समावेश है । ताप परे नित तेज लग्यौ अब, फागुन ग्रीष्म ऋतू भर आईं मेल    मिलाप  करें  ऋतु दो, बचकेउ  नव… Read more

भगवती वंदना (पद)

अब तौ  आजा  मात भवानी तोहि   रिझामें, तोहि   मनावें, रे  ! जग की ठकुरानी अर्चन - वंदन  कौ  विधान का, बोध न, हम  अज्ञानी श्रद्धामय   हो   थाल   सजायौ, करें    भाव   अगवानी कुमकुम  टीका   भाल लगाऊँ, ओढ  चुनरिया  धानी धूप, दीप,   नैवैद्य,  समर्पित,  तुमको   मा… Read more

मैंने देखी नारि हजार

मैंने   देखी   नारि   हजार पर    ऐसी   कहूँ   न पाई जब   देखी  पहली   बारी   बू   नारि   सुशीला  न्यारी बाने  कूटी  सब  ससुरारि संग पति की करी  कुटाई मैंने   देखी   नारि   हजार पर    ऐसी   कहूँ   न पाई आयौ    दूजी  कौ  नम्बर बाकौ   खातौ   पीत… Read more

उपेन्द्रवज्रा छंद

उपेंद्रवज्रा छंद  UPENDRAVJRA CHHAND [जतजगुगु] छंद विधान :  क्रमशः  जगण, तगण, जगण, दो गुरु न   साधना,  वंदन, मोहि  आवै तुम्हें  रिझाऊँ, विधि  को बतावै सुवासिनी   सिद्ध  सुकाज कीजै विवेक औ बुध्दि “नवीन” दीजै - नवीन श्रोत्रिय उत्कर्ष उपेन्… Read more