छंद : माहिया


इज्जत है  इबादत है 
सच   मानो   यारो
वो फक्त  मुहब्बत है 

कब  प्रेम  जताने को
झलका   इस  तरहा
तू  प्रीत  पै'माने को

मुझको न सताओ तुम
चाहतहै,    छल  है
ये  भेद बताओ  तुम

है  दर्द  मुहब्बत  ये
जीना  है    जिनको
उनकी  न जरूरत  ये

आरूप हुआ  रत   है 
तन की  चाह   लिये
ये  प्रेम  नहीं लत है 
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